पुलिसकर्मियों से नहीं होगी अधिक वेतन की वसूली, हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने आदेश किया रद्द

हाईकोर्ट

आरयू ब्यूरो, लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने पुलिस विभाग में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के गलत वेतन निर्धारण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने ऐसे 53 पुलिस कर्मियों से अधिक वेतन की वसूली के आदेशों को रद्द कर दिया है। साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया है कि इन कर्मचारियों के वेतन से काटी गई या समायोजित की गई अतिरिक्त धनराशि आठ हफ्तों के भीतर उन्हें वापस की जाए।

ये फैसला न्यायमूर्ति मनीष माथुर की एकल पीठ ने अमेठी जिले में तैनात पुलिस अनुवादक इबरार अहमद और मदन जी शुक्ल सहित 53 पुलिसकर्मियों द्वारा दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया। इन याचिकाओं में कथित रूप से अधिक भुगतान किए गए वेतन की वसूली के आदेशों को चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ताओं के वकील पंकज पांडेय ने कोर्ट में दलील दी कि इन कर्मचारियों का वेतन निर्धारण कानूनी प्रावधानों और 16 जनवरी 2007 के शासनादेश के अनुरूप नहीं किया गया था। उनका कहना था कि जब वेतन निर्धारण ही गलत था, तो अधिक भुगतान के नाम पर वसूली का आदेश कानून की मंशा के खिलाफ है।

कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार के वकील से ये भी पूछा था कि गलत वेतन निर्धारण के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ क्या कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है या प्रस्तावित है। वहीं सुनवाई के दौरान ये बात सामने आई कि पुलिस विभाग अपने कर्मचारियों के वेतन निर्धारण में दशकों से लापरवाही बरत रहा है। एक याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि उन्हें 2010 से ही गलत वेतन निर्धारण का नोटिस दिया गया था, जिसके बाद उनके वेतन से प्रतिमाह करीब छह हजार रुपये की कटौती की जा रही थी।

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गौरतलब है कि कोर्ट ने सरकारी वकील से इस बात पर नाराजगी जताई कि पुलिस विभाग को कर्मचारियों के गलत वेतन निर्धारण को ठीक करने में 15-20 साल से अधिक समय क्यों लग रहा है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि लगातार यह देखने में आ रहा है कि पुलिसकर्मी गलत वेतन निर्धारण के आदेशों को चुनौती दे रहे हैं। इस मामले की सुनवाई के बाद, हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग को निर्देश देते हुए सभी 53 याचिकाएं स्वीकार कर लीं। इस फैसले से उन सभी पुलिसकर्मियों को बड़ी राहत मिली है, जिन्हें गलत वेतन निर्धारण के कारण वित्तीय नुकसान उठाना पड़ रहा था।

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