इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूछा, केंद्रीय मंत्री के नाम के पहले क्यों नहीं लगाया ‘माननीय’, मुख्य सचिव से मांगा शपथ पत्र

इलाहाबाद उच्च न्यायालय

आरयू ब्यूरो, लखनऊ/प्रयागराज। एक केस की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने योगी सरकार पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट सरकार से पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआइआर में केंद्रीय मंत्री के नाम से पहले सम्मानजनक शब्द ‘माननीय’ या ‘श्रीमान’ न लिखने के लिए स्पष्टीकरण मांगा है।

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने राज्य के गृह सचिव से पूछा कि नाम के आगे सम्मानसूचक शब्द (जैसे “माननीय” या “श्री”) क्यों नहीं लिखा गया। कोर्ट ने कहा कि अगर शिकायत करने वाले ने यह शब्द नहीं भी लिखा हो, तब भी पुलिस की जिम्मेदारी थी कि वह नाम के आगे सम्मानसूचक शब्द जोड़ती। अदालत ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को शपथपत्र देकर यह बताना होगा कि एफआइआर में केंद्रीय मंत्री के नाम के आगे “माननीय” क्यों नहीं लिखा गया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि एक जगह तो मंत्री का नाम बिना “श्री” लगाए ही लिखा गया है, जो सही नहीं है। अदालत के अनुसार, अगर शिकायत करने वाले व्यक्ति ने मंत्री के नाम के साथ सही सम्मानसूचक शब्द नहीं लिखा था, तब भी पुलिस की जिम्मेदारी थी कि एफआइआर बनाते समय नियमों का पालन करे और “माननीय” जैसे शब्द जोड़ दे, चाहे उसे ब्रैकेट में ही क्यों न लिखना पड़े।

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दरअसल, हाईकोर्ट 31 मार्च को मथुरा में एक्सीडेंट के एक मामले में दर्ज एफआइआर को रद्द करने की सुनवाई कर रहा था। जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा। कोर्ट ने इस संबंध में अपर मुख्य सचिव (गृह) से हलफनामा दाखिल करके बताने को कहा है कि क्यों एफआइआर में केंद्रीय मंत्री का नाम सम्मानजक शब्द माननीय के साथ नहीं लिखा गया। हाईकोर्ट इस मामले की सुनवाई छह अप्रैल को करेगा।

जानिए कोर्ट ने क्या पूछा…

हाईकोर्ट ने एजीए शशि शेखर तिवारी से कहा, वह कोर्ट में यह सूचना देंगे कि फार्च्यूनर एसयूवी (रजिस्ट्रेशन नंबर UP52-BD-7799) का रजिस्टर्ड मालिक कौन है, जो प्रथम सूचनादाता के कथनानुसार उसके कब्जे में है और जिसे प्रथम याचिकाकर्ता द्वारा उसे दिया गया था।

बता दें कि मथुरा जिले के हाइवे थाने में साल 2025 के एक एफआइआर मामले में हाईकोर्ट सुनवाई कर रहा। इसमें आपराधिक धमकी और आपराधिक विश्वासघात के आरोपों वाली एफआइआर को रद्द करने की मांग की गई है। पुलिस शिकायत के अनुसार, आरोप है कि आरोपित ने शिकायतकर्ता से नौकरी दिलाने के बहाने 80 लाख रुपए लिए थे। बाद में वे यह रकम लौटाने में नाकाम रहे और उन्होंने शिकायतकर्ता को जान से मारने की धमकी भी दी। इस मामले में केंद्रीय मंत्री का नाम एफआइआर में दर्ज है। हालांकि, वह आरोपित नहीं हैं। एफआइआर को रद्द कराने के लिए हर्षित शर्मा, राहुल शर्मा, चिंटू चौधरी आदि ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।

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गौरतलब है कि 19 दिसंबर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ‘माननीय’ का प्रयोग केवल मंत्रियों और अन्य संप्रभु पदाधिकारियों के लिए उपयुक्त है, न कि नौकरशाहों या राज्य सरकार के अफसरों के लिए। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि इटावा के डीएम ने कानपुर के संभागीय आयुक्त को पत्राचार में ‘माननीय आयुक्त’ कहकर संबोधित किया है।