आरयू वेब टीम। दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को दिल्ली-एनसीआर में लगातार बिगड़ती वायु गुणवत्ता और ‘बहुत खराब’ श्रेणी में बने रहने वाले एयर क्वालिटी इंडेक्स को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने सवाल करते हुए पूछा कि जब सरकार लोगों को साफ हवा उपलब्ध नहीं करा पा रही है, तो कम से कम एयर प्यूरीफायर पर लगने वाले 18 प्रतिशत जीएसटी में छूट या कमी क्यों नहीं की जा रही है?
दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी में खराब होती वायु गुणवत्ता को देखते हुए जीएसटी काउंसिल को निर्देश दिया है कि वह जल्द से जल्द बैठक कर एयर प्यूरीफायर पर लगने वाले जीएसटी को कम या पूरी तरह खत्म करने पर विचार करे। चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की खंडपीठ ने सरकारी वकील से इस मुद्दे पर तुरंत निर्देश लेकर अदालत को सूचित करने के लिए कहा है।
अदालत ने इसे “इमरजेंसी स्थिति” करार देते हुए टिप्पणी की कि हर व्यक्ति दिन में लगभग 21,000 बार सांस लेता है और प्रदूषित हवा से होने वाले नुकसान की कल्पना कीजिए। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 26 दिसंबर तय की है, ताकि अधिकारियों के वकील काउंसिल की बैठक कब हो सकती है, इसकी जानकारी दे सकें।
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ये सुनवाई अधिवक्ता कपिल मदन द्वारा दायर जनहित याचिका (पीआइएल) पर हो रही है, जिसमें मांग की गई है कि एयर प्यूरीफायर को ‘मेडिकल डिवाइस’ के रूप में वर्गीकृत किया जाए। इससे इन पर लगने वाला जीएसटी 18 प्रतिशत से घटाकर मात्र पांच प्रतिशत किया जा सकता है। वकील कपिल मदान की दाखिल याचिका में कहा गया है कि दिल्ली में गंभीर प्रदूषण की अत्यधिक इमरजेंसी संकट स्थिति में एयर प्यूरीफायर को लग्जरी आइटम नहीं माना जा सकता। साफ इनडोर हवा स्वास्थ्य और जीवित रहने के लिए आवश्यक हो गई है। याचिका में तर्क दिया गया कि एयर प्यूरीफायर पर सबसे ऊंची स्लैब में जीएसटी लगाना इसे आर्थिक रूप से बड़ी आबादी के लिए पहुंच से बाहर कर देता है, जो मनमाना और असंवैधानिक है।




















