आरयू ब्यूरो, लखनऊ। यूपी विधानसभा सचिवालय ने बड़ा कदम उठाते हुए समाजवादी पार्टी से निष्कासित तीन विधायकों को असंबद्ध सदस्य घोषित कर दिया है। ये फैसला विधानसभा में जारी आदेश के जरिए सार्वजनिक किया गया। असंबद्ध घोषित किए जाने का मतलब यह है कि अब ये विधायक समाजवादी पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ नहीं बैठ सकेंगे। इनके लिए सदन में अलग बैठने की व्यवस्था की जाएगी, जैसा कि निर्दलीय या अन्य गैर-पार्टी सदस्यों के लिए होता है।
असंबद्ध घोषित किए गए विधायकों में रायबरेली की ऊंचाहार सीट से विधायक मनोज कुमार पांडेय, अमेठी से विधायक राकेश प्रताप सिंह और गौरीगंज से विधायक अभय सिंह शामिल हैं। ये तीनों नेता अब यूपी विधानसभा में न तो सपा खेमे का हिस्सा रहेंगे और न ही किसी मान्यता प्राप्त दल का, जब तक वे किसी नई पार्टी से औपचारिक रूप से नहीं जुड़ते। इन तीनों विधायकों के खिलाफ कार्रवाई का मुख्य कारण राज्यसभा चुनाव 2024 में की गई क्रॉस वोटिंग रही।
तीनों ने विधायकों ने अपनी पार्टी सपा को ही दांव देते हुए भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान किया था, जिसे समाजवादी पार्टी ने गंभीर अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधि मानते हुए निष्कासन का फैसला किया था। अब विधानसभा से असंबद्ध घोषित किए जाने के बाद यह कार्रवाई विधायी स्तर पर भी पूरी हो गई है।
वहीं मनोज पांडेय ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले समाजवादी पार्टी छोड़ दी थी। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चाएं तेज थीं कि उन्हें रायबरेली सीट से भाजपा का टिकट मिल सकता है, लेकिन यह टिकट दिनेश प्रताप सिंह को दे दिया गया। इसके बाद मनोज पांडेय ने दिनेश की चुनावी सभाओं से दूरी बनाए रखी, जिससे यह स्पष्ट संकेत मिला कि वे भाजपा से नाराज हैं। इसी नाराजगी को शांत करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खुद मनोज पांडेय के घर पहुंचे थे और उन्हें मनाया था। शाह से मुलाकात के बाद ही मनोज भाजपा के पक्ष में प्रचार करते नजर आए थे। हालांकि इन सबके बाद भी भाजपा को हार ही का सामना करना पड़ा था।
बता दें कि विधानसभा में असंबद्ध सदस्य घोषित किए जाने का मतलब यह है कि ये विधायक अब किसी भी मान्यता प्राप्त दल का हिस्सा नहीं रहेंगे, हालांकि इससे उनकी विधायक सदस्यता पर कोई असर नहीं पड़ेगा जब तक कि वे खुद इस्तीफा न दें या किसी विधिक प्रक्रिया से अयोग्य न ठहरा दिए जाएं, लेकिन इस नए दर्जे के साथ उनकी भूमिका, बैठने की व्यवस्था और विधायी प्रक्रिया में स्थिति अब भिन्न होगी, जिससे सदन में सत्ता पक्ष को रणनीतिक लाभ मिल सकता है।




















