फ्रीबीज पर सुप्रीम कोर्ट की राज्यों पर तल्ख टिप्पणी, अगर सब फ्री देंगे तो कहां से आएगा विकास का पैसा

सुप्रीम कोर्ट

आरयू वेब टीम। देश की सबसे बड़ी अदालत ने राजनीतिक दलों द्वारा चुनावी वादों में मुफ्त सुविधाओं (फ्रीबीज) के वितरण को लेकर तल्ख टिप्पणी की है। चीफ जस्टिस ने कहा कि कई राज्य सरकारें भारी कर्ज और घाटे के बावजूद मुफ्त योजनाएं बांट रही हैं। अगर सरकारें मुफ्त पैसे, बिजली और दूसरी सुविधाएं देती रहेंगी तो आखिर इनका खर्च कौन उठाएगा! कोर्ट ने जोर देकर कहा कि सरकारों को मुफ्त चीजें बांटने के बजाय रोजगार पैदा करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

ये टिप्पणी एक याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें तमिलनाडु सरकार की कुछ समुदायों के लिए बिजली टैरिफ में सब्सिडी स्कीम को चुनौती दी गई थी। इस स्कीम से पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ा, जिसके खिलाफ तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) रूल्स 2024 के रूल 23 का हवाला देते हुए कहा कि पावर कंपनियों को टैरिफ के जरिए पूरी लागत वसूली सुनिश्चित करनी चाहिए।

इस दौरान देश मे फ्रीबीज सिस्टम पर टिप्पणी करते हुए सीजेआइ सूर्यकांत ने कहा कि इस तरह से फ्रीबीज बांटने पर देश का इकोनॉमिक डेवलपमेंट रुकेगा। कुछ लोग एजुकेशन या बेसिक लाइफ़ अफ़ोर्ड नहीं कर सकते उन्हे सुविधा देना राज्य का फर्ज है, लेकिन जो लोग मजे कर रहे हैं.. फ्रीबीज पहले उनकी जेब में जा रहे हैं। क्या यह ऐसी चीज नहीं है जिस पर सरकारों ध्यान देना चाहिए। हम ऐसे राज्य की जानकारी हैं जहां फ्री बिजली है, भले ही आप बड़े लैंडलॉर्ड हों, आप लाइट जलाते हैं। अगर आपको कोई फैसिलिटी चाहिए तो आप उसके लिए पे करना होता हैं। ये टैक्स का पैसा है।

साथ ही कहा कि हम सिर्फ तमिलनाडु के बारे मे ही बात नहीं कर रहे हैं। हम ये पूछना चाहते है कि इलेक्शन से ठीक पहले स्कीम्स क्यों अनाउंस की जा रही हैं? इसपर सभी पॉलिटिकल पार्टीज, सोशियोलॉजिस्ट्स, आइडियोलॉजी पर फिर से सोचने की जरूरत है। यह कब तक चलेगा। राज्य घाटे में चल रहे हैं, लेकिन फिर भी मुफ्त में दे रहे हैं। अगर आप एक साल में 25 परसेंट रेवेन्यू इकट्ठा करते हैं, तो इसका इस्तेमाल राज्य के विकास के लिए क्यों नहीं किया जा सकता?

चीफ जस्टिस ने कहा कि राज्य सरकारों को फ्रीबीज और सार्वजनिक कल्याण योजनाओं के बीच अंतर समझना चाहिए, जहां गरीबों और वंचितों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रदान करना राज्य का कर्तव्य है, वहीं अमीरों या सक्षम लोगों को अनावश्यक मुफ्त सुविधाएं देना अनुचित है, अगर राज्य मुफ्त खाना, मुफ्त साइकिल, मुफ्त बिजली और सीधे कैश ट्रांसफर देती रहेंगी तो विकास के कामों के लिए पैसा कहां से आएगा!

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई राज्य है जो पहले से ही घाटे में हैं, फिर भी वे नई-नई कल्याण योजनाएं शुरू कर रहे हैं. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को कड़ी फटकार लगाई है,राज्य सरकार ने कुछ समुदायों के लिए बिजली टैरिफ में सब्सिडी स्कीम की घोषणा की थी। इससे पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी पर फाइनेंशियल दबाव पड़ा, जिसने राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ पावर डिस्ट्रिब्यूशन कंपनियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) रूल्स 2024 के रूल 23 के खिलाफ तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों को रेवेन्यू गैप को खत्म करने और सेक्टर की फाइनेंशियल वायबिलिटी बनाए रखने के लिए टैरिफ के जरिए पूरी कॉस्ट रिकवरी सुनिश्चित करनी चाहिए। सीजेआइ ने कहा कि राज्य को रोजगार के रास्ते खोलने के लिए काम करना चाहिए।

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आगे कहा कि अगर आप फ्री भोजन देना शुरू करते हैं.. फिर फ्री साइकिल.. फिर फ्री बिजली.. और अब हम एक ऐसे स्टेज पर पहुंच रहे हैं जहां हम सीधे लोगों के अकाउंट में कैश ट्रांसफर कर रहे हैं… सोचिए.. ज्यादातर राज्य रेवेन्यू डेफिसिट में हैं, लेकिन फिर भी सिर्फ इन पॉलिसी के लिए वे मजबूर हैं… फिर डेवलपमेंट के लिए पैसा नहीं है। अब राज्यो के पास सिर्फ दो चीजें हो रही हैं, एक ऑफिसर को सैलरी देना और इन पॉलिसी के लिए पेमेंट करना।

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