आरयू वेब टीम। अपनी शायरी से मोहब्बत, दर्द, तन्हाई और जिंदगी को नए अंदाज में बयां करने वाले मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र ने दुनिया को अलविदा कह दिया है। गुरुवार दोपहर करीब 12 बजे मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में उन्होंने 91 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली। बशीर बद्र के निधन की खबर सामने आते ही साहित्य जगत, उर्दू अदब और उनके लाखों चाहने वालों में शोक की लहर दौड़ गई।
बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया बीमारी से जूझ रहे थे। उनकी याददाश्त काफी कमजोर हो चुकी थी और वे लोगों को पहचान भी नहीं पा रहे थे। पिछले कुछ समय से उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी। बशीर बद्र ने उर्दू गजल को एक नया अंदाज दिया। उन्होंने पारंपरिक और भारी- भरकम उर्दू शब्दों की बजाय आसान, आम बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया।
यही वजह रही कि उनकी शायरी सीधे लोगों के दिलों तक पहुंची। उनकी गजलों में मोहब्बत, तन्हाई, दर्द, रिश्ते, जिंदगी और समाज के कई रंग दिखाई देते हैं। उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों और हादसों को भी शेरों में ढाला। बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुआ था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) से उच्च शिक्षा और पीएचडी पूरी की। साल 1969 में उन्होंने एएमयू से स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। इसके बाद 12 अगस्त 1974 को मेरठ कॉलेज के उर्दू विभाग में बतौर लेक्चरर नियुक्त हुए। वर्ष 1990 तक उन्होंने वहां अपनी सेवाएं दीं।
गौरतलब है कि 1974 से 1990 तक का दौर उनके जीवन का सबसे अहम और स्वर्णिम समय माना जाता है। इसी दौरान उनकी शायरी देश-दुनिया में पहचान बनाने लगी और वे उर्दू गजल के बड़े नाम बन गए। साल 1987 में मेरठ में हुए सांप्रदायिक दंगों ने उनकी जिंदगी बदल दी। दंगों में उनका घर जला दिया गया था। इस हादसे में उनकी कई दुर्लभ और अप्रकाशित रचनाएं हमेशा के लिए नष्ट हो गईं। इस घटना के बाद वे भोपाल आकर बस गए और यहीं से अपनी साहित्यिक यात्रा को आगे बढ़ाया।
इंदिरा गांधी ने सुनाया था उनका शेर
बशीर बद्र की शायरी का असर राजनीति और कूटनीति तक भी दिखाई दिया। शिमला समझौते के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भुट्टो को उनका मशहूर शेर सुनाया था। ‘दुश्मनी जमके करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त बन जाएं तो शर्मिंदा न हों।’ साहित्य और उर्दू गजल में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया था। उनकी किताबें और गजलें आज भी साहित्य प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं।
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बशीर बद्र सिर्फ एक शायर नहीं थे, बल्कि वे एहसासों की आवाज थे। उन्होंने गजल को आम लोगों तक पहुंचाया। उनकी शायरी में दर्द भी था, मोहब्बत भी थी और जिंदगी का गहरा सच भी। उनके जाने से उर्दू साहित्य और गजल की दुनिया ने अपनी सबसे नरम और असरदार आवाजों में से एक को खो दिया है।
उनकी चर्चित किताबों में ये शामिल हैं
इमकान
आहटें
कुल्लियात-ए-बशीर बद्र
उजाले अपनी यादों के।












