आरयू ब्यूरो, लखनऊ। यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने योगी सरकार की महत्वाकांक्षी अभ्युदय योजना में सामने आए फर्जीवाड़े को लेकर सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अखिलेश ने कहा है कि योगी सरकार को सिर्फ करोड़ों की वसूली से मतलब है, उसे गरीब मेहनती युवाओं की कोई परवाह नहीं है। 69 में से 48 चयन फर्जी पाए गए हैं, तो ये सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मेहनती युवाओं के भविष्य के साथ खुला खिलवाड़ है।
रविवार को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर पोस्टकर अखिलेश यादव ने कहा कि सरकार ये कहकर पल्ला झाड़ रही है कि “घोटाला नहीं, बल्कि सही बंटवारा नहीं हुआ”, लेकिन असल सवाल यह है कि जिन फर्जी नामों के सहारे विद्यार्थी और अभ्यर्थी तैयारी कर रहे थे, उनके भविष्य का क्या होगा? सरकार को सिर्फ़ करोड़ों की वसूली से मतलब है, जबकि गरीब युवाओं के सपनों और मेहनत की उसे कोई परवाह नहीं है। सपा मुखिया ने आशंका जताई कि इस पूरे प्रकरण की जांच केवल आर्थिक अनियमितता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इस दृष्टिकोण से भी होनी चाहिए कि कहीं यह पीडीए समाज के बच्चों के साथ कोई सुनियोजित साजिश तो नहीं है।
अखिलेश ने कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं किया गया कि जानबूझकर उन्हें घटिया कोचिंग के हवाले कर दिया जाए, ताकि वे प्रतियोगी परीक्षाएं पास न कर सकें और सरकार को उन्हें नौकरी न देनी पड़े। सपा अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार का एजेंडा ही नौकरी देना नहीं है, इसलिए वह युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने से भी नहीं हिचकती। उन्होंने मांग की कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष, उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, ताकि गरीब और पिछड़े वर्ग के बच्चों के साथ हो रहे अन्याय को रोका जा सके।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना में कोर्स कोऑर्डिनेटरों की भर्ती में गड़बड़ियों को लेकर समाज कल्याण विभाग के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण के निर्देश पर बीते 31 दिसम्बर को आउटसोर्सिंग कंपनी अवनि परिधि एनर्जी कम्युनिकेशन प्राइवेट लिमिटेड लखनऊ और संबंधित अभ्यर्थियों के खिलाफ थाना गोमतीनगर में षड्यंत्र, फर्जी दस्तावेज और नियम विरुद्ध नियुक्ति के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई गई है। इसके साथ ही पूरे मामले की प्रशासनिक जांच के आदेश भी दिए गए हैं।
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राज्यमंत्री के मुताबिक जांच में सामने आया कि नियमानुसार कोर्स कोऑर्डिनेटर पद के लिए यूपी पीसीएस मुख्य परीक्षा उत्तीर्ण होना अनिवार्य था, इसके बावजूद कई ऐसे अभ्यर्थियों को नियुक्त कर दिया गया, जिन्होंने यह परीक्षा पास ही नहीं की थी। कुल 69 अभ्यर्थियों की जांच में केवल 21 अभ्यर्थी पात्र पाए गए। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट हुआ कि अपात्र लोगों को नौकरी दिलाने के लिए फर्जी और कूटरचित दस्तावेजों का सहारा लिया गया। जिसमे प्रथम दृष्टया इस पूरे मामले में आउटसोर्सिंग कंपनी को दोषी माना गया है।




















