आरयू वेब टीम। देश की सबसे बड़ी अदालत ने गुरुवार को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के एक फैसले पर गहरी चिंता व्यक्त की है, जिसमें कथित रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा तैयार किए गए फर्जी न्यायिक उदाहरणों और गलत संदर्भों का उपयोग किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी न्यायिक या अर्ध-न्यायिक आदेश की विश्वसनीयता तथ्यों, प्रमाणों और स्थापित विधिक सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए। यदि तकनीकी उपकरणों द्वारा उत्पन्न अप्रमाणित सामग्री का बिना सत्यापन उपयोग किया जाता है, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि एआइ आधारित किसी भी प्रणाली में मानवीय हस्तक्षेप अनिवार्य है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अवलोकन में कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधुनिक तकनीक की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है और यह अनुसंधान, दस्तावेज विश्लेषण तथा सूचना संकलन जैसे अनेक क्षेत्रों में उपयोगी भूमिका निभा सकती है। हालांकि न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एआई केवल एक सहायक तकनीकी माध्यम है, अंतिम निर्णयकर्ता नहीं। यदि वकील, न्यायिक अधिकारी, शोधकर्ता अथवा अन्य पेशेवर बिना स्वतंत्र जांच-पड़ताल के एआइ द्वारा उपलब्ध कराई गई सामग्री पर पूर्ण निर्भरता बना लेते हैं, तो इससे गंभीर त्रुटियां और न्यायिक भूलें सामने आ सकती हैं। कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि एआई आधारित किसी भी प्रणाली में मानवीय हस्तक्षेप अनिवार्य है।
साथ ही कहा चाहे दस्तावेज तैयार करना हो, कानूनी शोध करना हो या किसी निर्णय का मसौदा बनाना हो, प्रत्येक चरण में विशेषज्ञ द्वारा तथ्यों, कानून और संदर्भों का स्वतंत्र सत्यापन किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तकनीक का उद्देश्य मानव क्षमता को सहयोग देना है, उसका स्थान लेना नहीं। इसलिए अंतिम उत्तरदायित्व सदैव संबंधित पेशेवर और संस्था का ही रहेगा। आगे कहा कि विशेषज्ञ लंबे समय से यह चेतावनी देते रहे हैं कि कई बार कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियां ऐसे न्यायिक निर्णय, शोध संदर्भ अथवा तथ्य प्रस्तुत कर सकती हैं, जिनका वास्तविक अस्तित्व ही नहीं होता।
इसे तकनीकी भाषा में ‘हैलुसिनेशन’ की समस्या कहा जाता है। यदि इन त्रुटिपूर्ण सूचनाओं का सत्यापन किए बिना उपयोग किया जाए तो न्यायिक, प्रशासनिक, शैक्षणिक और व्यावसायिक निर्णय प्रभावित हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी जोखिम की ओर संकेत करती है कि आधुनिक तकनीक का उपयोग विवेक और सावधानी के साथ किया जाना आवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणी केवल एक न्यायिक टिप्पणी नहीं, बल्कि तकनीक के जिम्मेदार उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन भी मानी जा रही है।
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