आरयू वेब टीम। देश की सबसे बड़ी अदालत ने बुधवार को उत्तर प्रदेश जेल प्राधिकरण को फटकार लगाई। साथ ही जमानत के बावजूद आरोपित की रिहाई न होने पर नाराजगी जाहिर की। जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वे आरोपित को हर्जाने के तौर पर पांच लाख रुपये दें।
दरअसल आरोपित को बीती 29 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया था। आरोपित के खिलाफ धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत मामला दर्ज किया गया था। उत्तर प्रदेश जेल प्रशासन के निदेशक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में पेश हुए। पीठ ने नाराज होते हुए पूछा कि ‘आपके अधिकारियों की संवेदनशीलता पर आपका क्या कहना है?’
पीठ ने कहा कि अधिकारियों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले नागरिक अधिकारों की अहमियत के बारे में संवेदनशील बनाया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘आजादी बेहद ही कीमती और अहम अधिकार है, जिसकी गारंटी हमारा संविधान देता है।’ वहीं यूपी सरकार की तरफ से पेश हुए वकील ने कहा कि आरोपित को मंगलवार को जेल से रिहा कर दिया गया और इस बात की जांच की जा रही है कि आरोपित की रिहाई में देरी क्यों हुई।
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इस पर अदालत ने कहा कि इसकी जांच गाजियाबाद के मुख्य जिला और सत्र न्यायाधीश द्वारा की जानी चाहिए और सुप्रीम कोर्ट ने जांच के बाद रिपोर्ट पेश करने को भी कहा। आरोपित ने दावा किया कि उसे धर्मांतरण विरोधी कानून की एक उपधारा के चलते रिहा नहीं किया गया क्योंकि जमानत आदेश में इसका जिक्र नहीं था।


















