आरयू ब्यूरो, प्रयागराज/लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत अर्जी निस्तारण में दस दिन से अधिक की देर पर यूपी सरकार पर 50 हजार का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारियों की लापरवाही और अदालत को केस डायरी उपलब्ध न कराने के कारण देरी हुई है। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की सिंगल बेंच ने मामले में सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए कि हर्जाने की राशि याचिकाकर्ताओं को तुरंत दी जाए। साथ ही जांच के बाद जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों से यह रकम वसूलने की पूरी छूट भी दी गयी है।
केस की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने संबंधित थाना प्रभारी, उपनिरीक्षक (दरोगा) और सर्किल अधिकारी (सीओ) को व्यक्तिगत रूप से तलब किया। जब कोर्ट ने थाना प्रभारी से देरी का कारण पूछा तो उन्होंने कांवड़ यात्रा की ड्यूटी और अवकाश का हवाला दिया। वहीं दरोगा ने इसे ‘कम्युनिकेशन गैप’ बताया, जबकि सीओ ने कहा कि उनके साथ तैनात हेड कांस्टेबल ने हाईकोर्ट से मिले संदेशों की जानकारी उन्हें नहीं दी। अधिकारियों के अलग-अलग जवाबों पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए इसे गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना।
ये केस बिजनौर के चांदपुर थाना क्षेत्र में दर्ज दहेज मृत्यु के केस से जुड़ा है। इस मामले में आरोपित बनाए गए सास-ससुर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की थी। जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि दहेज प्रताड़ना के ठोस साक्ष्य सामने नहीं आए हैं। गवाहों के बयान भी पति-पत्नी के सामान्य घरेलू विवाद की ओर इशारा करते हैं। इसके आधार पर अदालत ने दोनों आरोपितों को जमानत दे दी।
कोर्ट ने कहा कि संयुक्त निदेशक (अभियोजन) कार्यालय ने 17 जून को जमानत याचिका की प्रति पुलिस पैरोकार को उपलब्ध करा दी थी। इसके बाद 19 जून को पुलिस अधीक्षक को सूचना भेजी गई और 29 जून को रिमाइंडर भी जारी किया गया। बावजूद इसके पुलिस ने अदालत को जरूरी निर्देश और केस डायरी उपलब्ध नहीं कराई। तीन जुलाई को हाईकोर्ट ने सीसीटीएनएस पोर्टल के माध्यम से केस डायरी का पीडीएफ भेजने का निर्देश भी दिया था, लेकिन पुलिस ने केवल आरोपितों का आपराधिक इतिहास भेजा। आवश्यक दस्तावेज न मिलने से सुनवाई प्रभावित हुई और संबंधित अफसरों को अदालत में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना पड़ा।
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हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस समय पर केस डायरी और जरूरी दस्तावेज उपलब्ध करा देती तो जमानत याचिका का निस्तारण तीन जुलाई को ही हो जाता। अधिकारियों की लापरवाही के कारण सुनवाई में अनावश्यक देरी हुई। इसी आधार पर अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया और निर्देश दिया कि यह राशि याचिकाकर्ताओं को दी जाए।
साथ ही बिजनौर के पुलिस अधीक्षक को संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच करने और जरूरत पड़ने पर यह रकम उनसे वसूलने के निर्देश दिए। कोर्ट
ने अपने आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश के डीजीपी और बिजनौर के पुलिस अधीक्षक को भेजने का भी निर्देश दिया, ताकि मामले में आवश्यक प्रशासनिक कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।




















