आरयू ब्यूरो, लखनऊ। उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों की बदहाली का मामला राज्यसभा की याचिका समिति तक पहुंच गया है। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने स्कूलों की बदहाली के साथ ही मिड-डे मील में गड़बड़ी और यूपी के शिक्षा बजट का गलत इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए इनकी जांच की मांग समिति से की है।
अपने एक बयान में आज संजय सिंह ने कहा कि सरकारी स्कूलों में गरीब और वंचित परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं। अगर इन्हीं स्कूलों में बिजली, शौचालय, पेयजल, इंटरनेट, कंप्यूटर और पौष्टिक भोजन जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं होंगी तो यह सीधे बच्चों के भविष्य और शिक्षा के अधिकार पर चोट है।
भाजपा सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए राज्यसभा सांसद ने कहा कि एक तरफ सरकार शिक्षा के नाम पर हजारों करोड़ रुपये के बजट का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ योजनाओं की धनराशि पूरी तरह खर्च नहीं हो रही है। शिकायत में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, विद्यालय शिक्षा एवं साक्षरता विभाग की पांच केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए 62,660 करोड़ के बजट अनुमान के मुकाबले 13 फरवरी 2026 तक केवल 32,296.54 करोड़ खर्च हुए, यानी बजट अनुमान का लगभग 51.5 प्रतिशत। वहीं समग्र शिक्षा के 41,250 करोड़ के बजट अनुमान के मुकाबले उपयोग केवल 54.9 प्रतिशत रहा।
यूपी में नौ हजार से ज्यादा खर्च हुआ, लेकिन…
आंकड़ों को लेकर आप सांसद ने कहा कि यूपी में 2019-20 से 2021-22 के दौरान लगभग 9,103 करोड़ की धनराशि खर्च नहीं की गई, जबकि सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी बनी हुई है। यह गंभीर सवाल है कि जब स्कूलों को सुधारने के लिए पैसा उपलब्ध था तो उसका उपयोग क्यों नहीं किया गया।
पीएम-पोषण पर भी सवाल
संजय सिंह ने पीएम-पोषण योजना को लेकर भी कहा कि साल 2025-26 में ₹12,500 करोड़ के आवंटन के मुकाबले 13 फरवरी 2026 तक केवल 6,639.22 करोड़ खर्च हुए, जबकि बाद में संशोधित अनुमान घटाकर 10,600 करोड़ कर दिया गया। साथ ही लाभार्थी बच्चों की संख्या भी 2022-23 में 12.16 करोड़ से घटकर 2024-25 में 10.99 करोड़ रह गई।
स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का संकट
आप सांसद ने अपनी शिकायत में यूडीआइएसई 2025-26 के आंकड़ों के हवाले से भी यूपी के सरकारी स्कूलों की स्थिति पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
आंकड़ों के अनुसार स्कूलों में…
1,210 स्कूलों में कार्यशील पेयजल सुविधा नहीं है।
770 स्कूलों में पेयजल तक की सुविधा नहीं है।
8,738 विद्यालयों में हाथ धोने की सुविधा नहीं है।
6,460 विद्यालयों में बालिका शौचालय कार्यशील नहीं हैं।
5,054 विद्यालयों में बालक शौचालय कार्यशील नहीं हैं।
3,600 विद्यालयों में बिजली की व्यवस्था कार्यशील नहीं है।
26,151 विद्यालयों में बिजली कनेक्शन नहीं है।
63,590 विद्यालयों में खेल का मैदान नहीं है।
91,324 विद्यालयों में पिछले शैक्षणिक वर्ष में विद्यार्थियों का चिकित्सा परीक्षण नहीं कराया गया।
1,31,609 विद्यालयों में इंटरनेट सुविधा नहीं है।
2,59,414 विद्यालयों में डिजिटल लाइब्रेरी नहीं है।
47,897 विद्यालयों में लाइब्रेरी/बुक बैंक/रीडिंग कॉर्नर नहीं है।
1,01,407 विद्यालयों में शिक्षण-अधिगम के लिए कार्यशील कंप्यूटर नहीं हैं।
76,743 विद्यालयों में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए रैंप नहीं है।
संजय सिंह ने कहा कि ये आंकड़े बताते हैं कि ‘स्कूलों के कायाकल्प’ के दावों और जमीन पर स्कूलों की वास्तविक स्थिति के बीच बहुत बड़ा अंतर है।
मिड-डे मील की गुणवत्ता पर भी सवाल
संजय सिंह ने लखीमपुर खीरी और सीतापुर में मिड-डे मील से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि बच्चों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता और वास्तविक लाभार्थियों की संख्या की नियमित जांच होनी चाहिए। शिकायत में इन मामलों के संबंध में प्रशासनिक कार्रवाई का भी उल्लेख किया गया है।
संजय सिंह की समिति से मांग-
बुनियादी ढांचे का समग्र आकलन-
पूरे देश और राज्यवार सरकारी विद्यालयों के बुनियादी ढांचे का आकलन कराया जाए, जिसमें बिजली, कार्यशील शौचालय, पेयजल, कक्षाएँ, स्वच्छता और डिजिटल सुविधाएं शामिल हों तथा गंभीर कमियों की पहचान कर समयबद्ध तरीके से उनका समाधान कराया जाए।
योजनाओं की विस्तृत रिपोर्ट-
समग्र शिक्षा और पीएम-पोषण के संबंध में राज्यवार विस्तृत रिपोर्ट मंगाई जाए, जिसमें आवंटन, धनराशि जारी किए जाने, उपयोग, अप्रयुक्त शेष राशि तथा लाभार्थियों की संख्या का विवरण शामिल हो।
पीएम-पोषण का स्वतंत्र ऑडिट-
पीएम-पोषण के क्रियान्वयन का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए, जिसमें नामांकन, उपस्थिति, परोसे गए भोजन, उपलब्ध कराए गए खाद्यान्न और व्यय का मिलान किया जाए तथा उत्तर प्रदेश में सामने आई कथित अनियमितताओं पर विशेष ध्यान दिया जाए।
शिकायतकर्ताओं पर दर्ज मामलों की जांच-
पंकज अवाना और फिरोज सिद्दीकी से संबंधित FIR, शिकायतें, वीडियो, निरीक्षण रिपोर्ट तथा अन्य संबंधित अभिलेख मंगाए जाएँ और यह जांचा जाए कि संबंधित विद्यालयों के संबंध में उठाई गई मूल चिंताओं का स्वतंत्र रूप से सत्यापन किया गया था या नहीं।




















