आरयू वेब टीम। देहरादून की विशेष अदालत ने बाबा रामदेव के करीबी सहयोगी आचार्य बालकृष्ण से जुड़े चर्चित और करीब 15 साल पुराने फर्जी पासपोर्ट मामले में अपना फैसला सुनाया है। अदालत ने केस की सुनवाई पूरी करते हुए आचार्य बालकृष्ण को दोषमुक्त करार दिया है। जिससे पतंजलि योगपीठ और आचार्य बालकृष्ण के समर्थकों में खुशी की लहर है।
केंद्रीय जांच ब्यूरो ने साल 2011 में मामला दर्ज कर दावा किया था कि आचार्य बालकृष्ण ने भारतीय नागरिक न होते हुए भी फर्जी शैक्षणिक प्रमाण पत्रों के आधार पर पासपोर्ट हासिल किया था। जांच एजेंसी के अनुसार, उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर (खुर्जा) स्थित राधा कृष्ण संस्कृत महाविद्यालय के तत्कालीन प्राचार्य प्रोफेसर नरेश द्विवेदी ने उन्हें 1997 में कथित तौर पर फर्जी शैक्षणिक दस्तावेज उपलब्ध कराए थे, जिसके आधार पर पासपोर्ट जारी हुआ था।
इस मामले की सुनवाई के दौरान आचार्य बालकृष्ण के अधिवक्ताओं ने कोर्ट में तर्क दिया कि उनके खिलाफ लगाए गए सभी आरोप राजनीति से प्रेरित और बेबुनियाद थे। बचाव पक्ष ने कहा कि सभी शैक्षणिक दस्तावेज पूरी तरह वैध हैं और नियम-कानून के तहत ही पासपोर्ट बनवाया गया था। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को आरोप साबित करने के लिए अपर्याप्त माना।
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तृतीय अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने दोनों पक्षों की अंतिम बहस और गवाहों के बयानों का गहन अध्ययन करने के बाद आचार्य बालकृष्ण तथा सह-आरोपी प्रोफेसर नरेश द्विवेदी को बरी कर दिया। कोर्ट ने माना कि सीबीआइ ऐसा कोई ठोस या पुख्ता सबूत पेश नहीं कर सकी, जिससे धोखाधड़ी या जालसाजी की साजिश साबित होती हो। इस फैसले के बाद पतंजलि योगपीठ से जुड़े लोगों और बालकृष्ण के शुभचिंतकों ने अदालत के निर्णय का स्वागत किया है। पतंजलि के प्रतिनिधियों का कहना है कि सत्य की जीत हुई है और 15 वर्षों से चले आ रहे एक अनर्गल विवाद का अंत हो गया है।


















