आरयू वेब टीम। भारतीय रिजर्व बैंक ने बुधवार को मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी का ऐलान किया है। इसके साथ ही रेपो रेट 5.25 प्रतिशत से बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो गया है। आरबीआइ का ये फैसला बाजार की उम्मीदों के मुताबिक है। बढ़ती महंगाई, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और रुपये पर दबाव के बीच केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक नीति को सख्त करने का फैसला लिया है।
25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी के बाद अब बैंकों के लिए आरबीआइ से कर्ज लेना महंगा होगा। इसका असर आगे चलकर बैंकों की लोन ब्याज दरों और ईएमआइ पर भी पड़ सकता है। आरबीआइ के फैसले के पीछे महंगाई का बढ़ता दबाव एक प्रमुख वजह है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और रुपये पर दबाव ने भी आर्थिक परिस्थितियों को चुनौतीपूर्ण बनाया है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक खुदरा महंगाई अगस्त में 4.82 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, जो आरबीआइ के चार प्रतिशत के मध्यम अवधि के लक्ष्य से लगातार तीसरे महीने ऊपर रही।
आरबीआइ के फैसले से पहले ही बुधवार को भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली का दबाव देखने को मिला था। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 453 अंक से ज्यादा टूटकर 72,614 के आसपास पहुंच गया था, जबकि निफ्टी करीब 165 अंक गिरकर 22,611 के स्तर पर आ गया था। बाजार में खास तौर पर बैंकिंग, ऑटो, एफएमसीजी और रियल्टी जैसे ब्याज दर से प्रभावित होने वाले सेक्टरों में दबाव देखने को मिला था। आरबीआइ के फैसले और आगे के रुख पर निवेशकों की नजर बनी हुई है।
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रेपो रेट बढ़ने का सीधा असर सबसे पहले बैंकों की फंडिंग लागत पर पड़ता है। यदि बैंक अपनी लोन ब्याज दरों में बढ़ोतरी करते हैं तो होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ईएमआइ बढ़ सकती है। रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी के बाद अब बाजार की नजर आरबीआइ गवर्नर संजय मल्होत्रा के आगे के संकेतों पर है। निवेशक यह जानना चाहेंगे कि महंगाई और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए आने वाली बैठकों में भी दरों में बढ़ोतरी की संभावना है या नहीं।




















