उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूरी का निधन, राजनीति जगत में शोक

भुवनचंद्र खंडूरी
भुवनचंद्र खंडूरी। (फाइल फोटो)

आरयू वेब टीम। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता मेजर जनरल भुवनचंद्र खंडूड़ी (सेवानिवृत्त) का मंगलवार को निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे और देहरादून के मैक्स अस्पताल में वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे। खंडूरी के निधन की खबर सामने आते ही राजनीतिक और सामाजिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई।

भुवनचंद्र खंडूरी लंबे समय से बीमार चल रहे थे और देहरादून के मैक्स अस्पताल में उनका इलाज जारी था। बताया जा रहा है कि वह हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। मंगलवार दिन में करीब 11:15 बजे खंडूरी ने अंतिम सांस ली। पूर्व सीएम के निधन की पुष्टि उनकी बेटी और उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी ने की।

ऋतु खंडूरी ने भावुक संदेश जारी करते हुए कहा कि बेहद दुख के साथ यह सूचना दे रही हैं कि उनके आदरणीय जनरल साहब अब इस दुनिया में नहीं रहे। वहीं उनके बेटे मनीष खंडूरी ने भी सोशल मीडिया के जरिए पिता के निधन की जानकारी साझा की। मनीष खंडूरी ने कहा कि उनके पिता ही उनका सबकुछ थे। वह केवल पिता ही नहीं बल्कि उनके लिए भगवान समान थे।

भुवन चंद्र खंडूड़ी 2007 से 2009 और फिर 2011 से 2012 तक दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे। सेना से मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद खंडूड़ी ने राजनीति में कदम रखा। वह पहली बार 1991 में गढ़वाल लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद कई बार संसद पहुंचे और भाजपा के मजबूत पहाड़ी चेहरे के रूप में स्थापित हुए।

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उन्हें सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई। उनके कार्यकाल में देश में सड़क नेटवर्क को मजबूत करने की दिशा में बड़े कदम उठाए गए। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना को प्रभावी तरीके से लागू कराने में उनकी भूमिका बेहद अहम मानी जाती है। दूरदराज के गांवों तक सड़क पहुंचाने की उनकी प्रशासनिक क्षमता और सख्ती को आज भी याद किया जाता है।

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2007 में उत्तराखंड में भाजपा सरकार बनने के बाद खंडूड़ी पहली बार मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल अनुशासन, पारदर्शिता और कठोर प्रशासन के लिए जाना गया। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी सख्त कार्यशैली के कारण उन्हें ‘कड़क मुख्यमंत्री’ कहा जाने लगा, हालांकि उनकी सख्ती कई नेताओं और विधायकों को असहज भी करती रही। 2009 लोकसभा चुनाव में भाजपा के खराब प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। बाद में 2011 में पार्टी ने एक बार फिर उन पर भरोसा जताया और उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाया।

2012 विधानसभा चुनाव में उन्हें कोटद्वार सीट से हार का सामना करना पड़ा, लेकिन जनता के बीच उनका सम्मान बरकरार रहा। 2014 में वह एक बार फिर गढ़वाल लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य कारणों के चलते उन्होंने बाद के वर्षों में सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली।

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